Avdhut Geeta



ईश्वगनुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना।
महभ्दयपरित्राणा विप्रामामुपजायते।।1।।


बडे भय से रक्षा करनेवाली अभेदबुध्दि पुरुष श्रेष्ठ ब्राह्मणों 

में उत्पन्न होती है ।।1।।


Promiscuity wisdom occurs in the great 

Brahmins, which is able to defense  any kind 

of awfully


येनेदंपूरितं सर्वमात्मनैवात्मनात्मनि।
निराकारंकथंवन्दे ह्यभिन्नंशिवमव्ययम्।।2।।


जिसने अपने आत्मारुप माया से इस सब विश्व को अपने 

बीचमें रचा है वह निराकार है, सब में व्याप्त है, 

कल्याणरुप है, अविनाशी हैं, उसकी किस तरह वन्दना 

करुँ।।2।।



पञ्चभूतात्मकं विश्वं मरीचिजलसन्निभम्।
कस्याप्य हो नमस्कुर्यामहमेको निरञ्जनः ।।3।।

पृथ्वी जल तेज वायु आकाश इन पांच तत्वों से बना हुआ
 जो जगत है सो मृगतृष्णाके जलके समान झूठा है मैं एक 
और निरंजन हूँ अहो मैं किसके लिये नमस्कार करुँ।।3।।


आत्मैव केवलं सर्वं भेदाभेदो न विद्यते ।


अस्तिनास्तिकथं ब्रूयां विस्मयःप्रतिभाति मे ।।4।।

केवल आत्मा ही सबमें है इसमें भेद और अभेद कुछ नहीं है इसके सम्बन्ध में अस्ति नास्ति ( है वा नहीं है) किस तरह कहा जाय ये मुझको बडा आश्चर्य मालुम होता है।।4।।


वेदान्तसारसर्वस्वं ज्ञानविज्ञानमेव च ।
अगमात्मानिराकारःसर्वव्यापी स्वभावतः।।5।।

वेदान्तों का सार सर्वस्व यही हैं और यही ज्ञान, विज्ञान हैं कि स्वभाव से सब में बर्तने वाला और निराकार जो आत्मा हैं, वह मैं ही हूँ ।।5।।


यो वै सर्वात्मको देवो निष्कलो गगनोपमः ।
स्वाभाव निर्मलःशुध्दःसएवाहं न संशयः ।।6।।

जो देव सबकी आत्मा है कला रहित है आकाश के समान है, स्वभाव से निर्मल और शुध्द है, वही मै हूँ । इसमें संदेह नहीं है ।।6।।

अहमेवाव्ययोनन्तःशुध्दविज्ञानविग्रहः।
सुखं दुःखं न जानामि कथं कस्यापिवर्तते।।7।।

मैं ही अविनाशी और अनन्त(जिसका अन्त नहीं है) हूँ, शुध्द ज्ञानस्वरुप में ही हूँ। सुख और दुःख किसको और किस तरह उपस्थित होते है यह मैं नहीं जानता हूँ।।7।।

न मानसं कर्म शुभा शुभं मे।
न कायिकं कर्म शुभाशुभं मे।।
न वाचिकं कर्म शुभाशुभं मे।
ज्ञानामृतं शुध्दमतींद्रियहम्।।8।।


मेरे बीच में मन संबन्धी शूभ अशुभ कर्म नहीं हैं शरीर संबन्धी शुभ अशुभ कर्म मुझमें नहीं हैं मैं ज्ञानअमृत स्वरुप हूँ, शुध्द हूँ और इन्द्रियों से परें हूँ।।8।।




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