कथं
ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च
कथं प्राप्तमेतद्ब्रूहि मम प्रभो ।।1।।
समर्थ
गुरुदेव! ज्ञान प्रप्तिका क्या उपाय है ? मेरी मुक्ति किस प्रकार होगी? वैराग्य कैसे
मिलेगा? आप कृपा करके मुझे बतलाइये ।।1।।
King
Janaka asks – How is knowledge to be acquired? How is liberation to be attained?
And how is dispassion to be reached? Tell me this.
मुक्तिमिच्छसि
चेत्तात्, विषयान विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोष,
सत्यं पीयूषवभ्दज ।।2।।
अष्टावक्रजी
जनकजी के प्रति कहते हैं कि हे तात! यदि तुम संसार से मुक्त होने की इच्छा करते हो,
तो चक्षु, रसना आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियों के जो शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषय हैं,
उनको तू विष की तरह त्याग दे, क्योंकि जैसे विष के खाने से पुरुष मर जाता है, वैसे
ही इन विषयों के भोगने से भी पुरुष संसार-चक्र-रुपी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
इसलिए मुमुक्षु को प्रथम इनका त्याग करना आवश्यक है, और इन विषयों के अत्यंत भोगने
से रोग आदि उत्पन्न होते हैं और बुध्दि भी
मलिन होती है। एवं सार और असार वस्तु का विवेक नहीं रहता है। इसलिए ज्ञान के
अधिकारी को अर्थात मुमुक्षु को इनका त्याग करना ही मुख्य कर्तव्य है।
Sri Ashtavakra answers – If you
are seeking liberation, my son, shun the object of the senses like poison. Practice tolerance,
sincerity, compassion, contentment and truthfulness like nectar ।।2।।
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